श्री प्रेमानंद जी महाराज का संदेश: गृहस्थ धर्म और भक्ति से प्राप्त करें भगवत कृपा

श्री प्रेमानंद जी महाराज के प्रवचन जीवन को सात्विक और आध्यात्मिक बनाने का एक अनमोल मार्ग दिखाते हैं। उनके उपदेशों में गृहस्थ जीवन और भक्ति का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। एक भक्त की जिज्ञासा के जवाब में, उन्होंने गृहस्थ धर्म, नाम जप, और परोपकार के महत्व को बताया। यह लेख उनके इस संदेश को विस्तार से समझाता है, जिसमें एक भक्त की मंत्र दीक्षा, गृहस्थ जीवन में प्रेम, और भगवत प्राप्ति का मार्ग शामिल है। राधे-राधे!

भक्त की जिज्ञासा और महाराज जी का मार्गदर्शन

पंजाब के एक भक्त, गौरव जी, ने श्री प्रेमानंद जी महाराज से अपनी आध्यात्मिक और गृहस्थ जीवन की जिज्ञासा साझा की। उन्होंने बताया कि उन्हें मंत्र दीक्षा प्राप्त हो चुकी है, और वे रोजाना माला जप और 84 जी का पाठ करते हैं। वे निकुंज (वृंदावन) जाना चाहते हैं, लेकिन उनकी सात महीने पहले हुई शादी के बाद उनकी धर्मपत्नी के साथ गहरी आसक्ति हो गई है। उन्हें एक-दूसरे को खोने का डर रहता है, और अब वे एक-दूसरे की मन की बात भी समझने लगे हैं।

महाराज जी ने इस जिज्ञासा का जवाब देते हुए कहा, “कोई बात नहीं, उसमें भगवत भाव रखो और धर्मपूर्वक विषय सेवन करो।” उन्होंने सलाह दी कि नाम जप करें, माता-पिता की सेवा करें, और समाज में किसी भी जीव को कष्ट में देखकर हृदय द्रवित होकर उसका परोपकार करें। यह सत् कर्म और भगवत भाव ही भगवत प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

गृहस्थ धर्म में प्रेम का महत्व

महाराज जी ने जोर दिया कि पति-पत्नी का प्रेम अहोभाग्य है। वे कहते हैं, “हमारे समाज में लोग अपनी पत्नी या पति से प्यार करें, पराई स्त्री या पुरुष से गंदा आचरण न करें।” यदि पहले कोई गलती हुई हो, तो उसे स्वीकार कर छोड़ दें। गृहस्थ धर्म में पति-पत्नी का प्रेम और धर्मयुक्त जीवन ही सच्चा सुख देता है।

वे कहते हैं कि यह सौभाग्य की बात है जब पति-पत्नी में गहरा प्रेम और विश्वास हो। “पत्नी अपने पति से प्यार करे, पति अपनी पत्नी से प्यार करे”—यह गृहस्थ धर्म का आधार है। इस प्रेम में भगवत भाव रखना चाहिए, ताकि यह सात्विक और पवित्र रहे। अनैतिक संबंध, व्यभिचार, और गंदे आचरण को त्यागकर हमें सात्विक जीवन जीना चाहिए।

नाम जप और सत् कर्म: भगवत प्राप्ति का मार्ग

महाराज जी सिखाते हैं कि नाम जप और सत् कर्म भगवत प्राप्ति के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं। हनुमान चालीसा, रामचरितमानस, या अन्य स्तोत्रों का नियमित पाठ मन को शुद्ध और आत्मा को बल देता है। वे कहते हैं, “नाम जप करो, अच्छे आचरण करो।” नाम जप से नकारात्मक विचार दूर होते हैं, और मन में सकारात्मकता और शांति का संचार होता है।

इसके साथ ही, माता-पिता की सेवा और परोपकार भी भक्ति का अभिन्न अंग हैं। महाराज जी कहते हैं, “समाज में किसी भी जीव को कष्ट में देखकर हृदय द्रवित हो जाए, और उसकी मदद करो।” यह परोपकारी भाव ही हमें भगवान के करीब ले जाता है। चाहे वह इंसान हो या अन्य जीव, सभी के प्रति दया और सेवा का भाव रखना चाहिए।

जीव दया और पवित्रता

महाराज जी बार-बार जीव दया की शिक्षा देते हैं। वे कहते हैं, “हर जीव में भगवान विराजमान हैं।” जीव हिंसा, जैसे मांसाहार, शराब, या अनैतिकता, पाप कर्म हैं, जो हमें दुख और विपत्ति की ओर ले जाते हैं। शाकाहारी जीवन, पवित्रता, और संयम अपनाकर हम अपने कर्मों को शुद्ध कर सकते हैं।

वे कहते हैं, “जो जीव को काटकर खाते हो, वही काल तुम्हें काटेगा।” इसलिए, हमें सभी जीवों के प्रति दया का भाव रखना चाहिए। पवित्रता और जितेंद्रियता में वह शक्ति है, जो हमारे ऋषि-मुनियों ने अपनाई। यह हमें आध्यात्मिक और मानसिक बल देता है।

गृहस्थ जीवन में भगवत भाव

महाराज जी गृहस्थ जीवन को आध्यात्मिकता के साथ जोड़ने की सलाह देते हैं। वे कहते हैं कि पति-पत्नी का प्रेम सात्विक और धर्मयुक्त होना चाहिए। नाम जप, सत्संग, और परोपकार के साथ गृहस्थ जीवन जीने से यह न केवल सुखमय बनता है, बल्कि भगवत प्राप्ति का मार्ग भी खुलता है।

वे समाज को संदेश देते हैं कि अनैतिकता, जीव हिंसा, और स्वार्थ छोड़कर हमें पवित्रता, प्रेम, और सेवा भाव अपनाना चाहिए। माता-पिता की सेवा, गरीबों की मदद, और जीव दया गृहस्थ धर्म के साथ-साथ भक्ति का भी हिस्सा हैं।

जीवन को आनंदमय बनाने का सूत्र

महाराज जी कहते हैं कि मनुष्य जीवन एक अनमोल उपहार है, लेकिन यह विपत्तियों और संघर्षों से भरा है। यदि हम पाप कर्म करते हैं, तो यह दुख को और बढ़ाता है। नाम जप, सत् कर्म, और परोपकार ही वह मार्ग है, जो हमें सच्चे आनंद की ओर ले जाता है। वे कहते हैं, “अच्छे आचरण करो, हर जीव की सेवा करो, तब तुम्हारा मंगल होगा।”

सत्संग, ध्यान, और प्रार्थना हमें ईश्वर से जोड़ते हैं। माता-पिता की सेवा, समाज में परोपकार, और सात्विक जीवन अपनाकर हम अपने कर्मों को शुद्ध कर सकते हैं। यह जीवन को न केवल सुखमय बनाता है, बल्कि हमें भगवत प्राप्ति के करीब भी ले जाता है।

निष्कर्ष

श्री प्रेमानंद जी महाराज का संदेश हमें सिखाता है कि गृहस्थ धर्म और भक्ति का समन्वय जीवन को सुखमय और मंगलमय बनाता है। पति-पत्नी का प्रेम, नाम जप, माता-पिता की सेवा, और परोपकार भगवत प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। जीव दया, पवित्रता, और सत् कर्म अपनाकर हम अपने कर्मों को शुद्ध कर सकते हैं। महाराज जी की सलाह है कि अनैतिकता और पाप कर्म छोड़कर सात्विक जीवन जिएं, ताकि हम भगवान की कृपा और सच्चा आनंद प्राप्त करें। राधे-राधे!

डिस्क्लइमर [ disclaimer ] श्री पूज्य गुरुवर्य प्रेमानंद जी महाराज जी विश्व के मानवता कल्याण के लिए पर्वत इतने बढ़े ज्ञान का अमृत दे रहे है.. वेबसाइट की माध्यम से वही ज्ञान प्रसार लोगों को देना का काम एक चींटी की भाती प्रयास कर रहा हूं.. श्री गुरुवर्य महाराज के ज्ञान प्रसार के लिए बल प्रदान करे..राधे..राधे..

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